जन्माष्टमी स्मार्त

date  2019
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जन्माष्टमी स्मार्त
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हम जन्माष्टमी क्यों मनाते हैं?

भगवान कृष्ण के जन्म का उत्सव मनाने के लिए जन्माष्टमी को भारत में हिंदुओं द्वारा मनाए जाने वाले सबसे शुभ और महत्वपूर्ण त्यौहारों में से एक माना जाता है। हिंदुओं के बीच यह एक अत्यंत महत्वपूर्ण त्योहार है क्योंकि भगवान श्री कृष्ण का जन्म इस दिन भगवान विष्णु के अवतार के रूप में हुआ था। ऐसा माना जाता है कि भगवान कृष्ण का जन्म मध्यरात्रि में मथुरा शहर में पांच हज़ार वर्ष पहले द्वापर युग में हुआ था। कृष्ण जन्माष्टमी एक लोकप्रिय और बहुत प्रतीक्षित उत्सव है और पूरे भारत में गोकुलष्टमी, साटम आठम , कृष्णाष्टमी, श्रीकृष्ण जयंती और अष्टमी रोहिणी जैसे विभिन्न नामों में मनाया जाता है।

जन्माष्टमी कब है?

हिंदू पंचांग के अनुसार कृष्ण जन्माष्टमी या भगवान श्रीकृष्ण की जयंती भद्रपद माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि (आठवें दिन) को मनाई जाती है।

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कृष्णा जन्माष्टमी का महत्व क्या है?

हिंदू कैलेंडर के अनुसार, श्रीकृष्ण जन्माष्टमी का उत्सव आम तौर पर रोहिणी नक्षत्र में अगस्त-सितंबर में आता है। भक्त, इस उत्सव को पूरे भारत में और कुछ विदेशों में भी भक्ति और शक्ति के साथ मनाते हैं। कृष्ण जन्माष्टमी का एक दिलचस्प और महत्वपूर्ण पहलू दही हांड़ी का अनुष्ठान है। दही हांड़ी का उत्सव भगवान श्रीकृष्ण की सबसे पसंदीदा गतिविधि दर्शाता है जहां युवा लोगों का दल मिट्टी के बर्तन (हांड़ी) को तोड़ता है जो दही से भरी हुई होती है। जन्माष्टमी का दिन मध्यरात्रि तक मनाया जाता है क्योंकि मध्यरात्रि को भगवान कृष्ण का जन्म हुआ था और इसे अगले दिन दही हांड़ी उत्सव के रूप में बहुत अधिक उत्साह के साथ मनाया जाता है।

कृष्ण जन्माष्टमी व्रत

कृष्ण जन्माष्टमी की पूर्व संध्या पर, पूरे भारत में लाखों भक्त भगवान कृष्ण के लिए उपवास रखते हैं। जो लोग जन्माष्टमी व्रत का पालन करते हैं, वे उपवास शुरू होने से पहले एक संकल्प लेते हैं, जिसे अगले दिन समाप्त करते हैं जब अष्टमी तिथि और रोहिणी नक्षत्र समाप्त होता है। भक्त सुबह अनुष्ठान करते हैं और संकल्प लेने के बाद उपवास शुरू करते हैं।

कृष्ण पूजा वैदिक समय निर्धारण के अनुसार निषित काल (आधी रात) के दौरान की जाती है। एक विशिष्ट षोडशोपचार पूजा विधि है जिसके बाद भक्त रीति-रिवाज के अनुसार पूजा करते हैं। षोडशोपचार पूजा विधि में पूर्ण औपचारिक पूजा के सभी सोलह चरणों का समावेश होता है। जन्माष्टमी पूजा के बाद मंत्रों का जप किया जाता है जिसमें निरंतर आधार पर 'हरे राम हरे कृष्ण' का जप भी शामिल है।

हिंदू पुराणों के अनुसार, ऐसा माना जाता है कि भगवान श्रीकृष्ण का जन्म अष्टमी यानी आठवें चंद्र दिवस पर हुआ था जब चंद्रमा रोहिणी नक्षत्र में होता है। इस पवित्र दिन को कृष्ण जन्माष्टमी के रूप में चिह्नित किया गया है क्योंकि भगवान श्रीकृष्ण हिंदू समुदाय के सबसे प्रिय और पूजनीय देवताओं में से एक हैं जो इस दिन पैदा हुए थे। भगवान कृष्ण भगवान विष्णु के आठ अवतारों में से एक हैं।

जन्माष्टमी व्रत विधान क्या है?

भगवान कृष्ण की पूजा करने और उनका आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए कृष्ण जन्माष्टमी व्रत रखते हुए भक्तों द्वारा कठोर अनुष्ठान किया जाना चाहिए। इस व्रत को रखने वाले लोगों को सूर्योदय की अवधि के बाद मध्यरात्रि तक किसी भी तरह के अनाज के सेवन से दूर रहना चाहिए। कृष्ण जन्माष्टमी व्रत के समय किए गए अनुष्ठान एकादशी व्रत के दौरान किए गए अनुष्ठानों के समान हैं।

पारण अनुष्ठान करने का एक विशेष समय होता है जब उपवास सम्पूर्ण किया जाता है। सूर्योदय के बाद अष्टमी तिथि और रोहिणी नक्षत्र खत्म हो जाने पर पारण अनुष्ठान किया जाता है। यदि अष्टमी तिथि का रोहिणी नक्षत्र अगले दिन भी जारी रहता है, तो भक्तों का उपवास खत्म हो सकता है यदि दोनों में से एक खत्म हो गया है तो। अष्टमी तिथि और रोहिणी नक्षत्र के आधार पर उपवास दो दिनों तक रखा जा सकता है। धर्मसिंधु के अनुसार, भक्त अगले दिन भी अपने उपवास को समाप्त कर सकते हैं यदि वे इसे पूरे दो दिनों तक रखने में असमर्थ हैं।

हम जन्माष्टमी का उत्सव कैसे मनाते हैं?

कृष्ण जन्माष्टमी का अवसर दुनिया भर में हिंदुओं द्वारा बहुत भक्ति, प्रेम और उत्साह से मनाया जाता है। भक्त पवित्र भगवतगीता में वर्णित भगवान श्री कृष्ण की कहानी सुनकर या इस पवित्र दिवस पर व्रत रख कर अपने प्यार और समर्पण का प्रदर्शन करते हैं। भगवान कृष्ण के मंदिर फूल, माला और सजावटी वस्तुओं से सजाए जाते हैं । छोटे बच्चे राधा जी और कृष्ण जी के रूप में कपड़े पहनते हैं जो भगवान कृष्णा की बचपन की स्मृतियों को दर्शाते हुए जन्माष्टमी की पूर्व संध्या पर कई झांकियां प्रस्तुत करते हैं।

जब भगवान कृष्ण जन्म लेते हैं, यानी आधी रात के बाद, तब घर की बनी हुई मिठाइयां प्रस्तुत करते हुए आरती करके भक्त अपने उपवास को सम्पूर्ण करते हैं। स्वादिष्ट भोजन तैयार किए जाते हैं और उपवास और पूजा समाप्त होने के बाद परिवार, दोस्तों और रिश्तेदारों को प्रस्तुत किये जाते हैं।

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कृष्ण जन्माष्टमी उत्सव के लिए लोकप्रिय स्थान कौन से हैं?

कृष्ण जन्माष्टमी का बहुत महत्व है और यही कारण है कि यह दक्षिण के साथ भारत के उत्तरी हिस्सों में समान रूप से मनाया जाता है। इस त्यौहार की तैयारी कुछ हफ्तों से पहले शुरू होती है क्योंकि यह कुछ स्थानों में भव्य स्तर पर मनाया जाता है। देश के विभिन्न हिस्सों में, यह त्यौहार विभिन्न तरीकों से मनाया जाता है। जब दक्षिणी भारत की बात आती है, तो यह त्यौहार मुख्य रूप से तमिलनाडु और कर्नाटक राज्यों में मनाया जाता है जहां श्री कृष्ण भगवान की मूर्ति रखने के लिए मंतापा स्थापित किया जाता है। विशेष व्यंजन जैसे भक्षणं के साथ-साथ कुछ विशेष फलों की भी देवता को पेशकश की जाती है।

कृष्णा जन्माष्टमी समारोहों के लिए सबसे लोकप्रिय स्थान वृंदावन (जहां भगवान कृष्ण बड़े हुए थे) और गोकुल (भगवान कृष्ण का जन्मस्थान) है । भगवान कृष्ण के जन्म का उत्सव मनाने और दही हांडी आयोजन करने के लिए इन स्थानों पर हजारों भक्त मौजूद रहते हैं। युवा लड़के एक पिरामिड बनाते हैं जो दही हांडी आयोजन के लिए दही से भरी हुई हांडी को तोड़ने का प्रयास करते हैं। पूर्वोत्तर राज्यों जैसे पश्चिम बंगाल, उड़ीसा और द्वारका जैसे शहरों और इसी तरह के अन्य स्थानों पर भक्त उपवास रखते हैं और मध्यरात्रि में जन्माष्टमी पूजा करते हैं।

दो कृष्ण जन्माष्टमी तिथियां क्यों होती हैं ?

संप्रदाय के अनुसार जन्माष्टमी मूल रूप से लगातार दो दिनों तक आती है। विशेष रूप से दो संप्रदाय होते हैं जो कि वैष्णव संप्रदाय और स्मर्ता संप्रदाय हैं। जब जन्माष्टमी की तारीख एक ही होती है तो वैष्णव संप्रदाय और स्मर्ता संप्रदाय दोनों एक ही तारीख का पालन करते हैं और उसी दिन जन्माष्टमी का उत्सव मनाते हैं। लेकिन यदि तिथियां अलग हैं तो स्मर्ता संप्रदाय पहली तारीख को मनाते हैं और वैष्णव संप्रदाय बाद की तारीख में मनाते हैं ।

उत्तरी भारत के लोग समानता को देखते हैं और कृष्णा जन्माष्टमी उसी दिन मनाते हैं। यह इस्कॉन (कृष्णा चेतना के लिए अंतर्राष्ट्रीय समाज) पर आधारित है जो एक वैष्णव सिद्धांत आधारित समाज है। इस्कॉन अनुयायियों की अधिकतम संख्या में भी वैष्णव धर्म को मानने वाले अनुयायी शामिल हैं ।

स्मर्ता अनुयायी जन्माष्टमी तिथि का पालन नहीं करते हैं जो इस्कॉन पर आधारित है क्योंकि वे स्मर्ता अनुष्ठानों और वैष्णव अनुष्ठानों के बीच अंतर पाते हैं। वैष्णव संस्कृति अष्टमी तिथि और रोहिणी नक्षत्र के प्रति प्रतिबद्ध है और वे उसी हिसाब से त्यौहार मनाते हैं लेकिन स्मर्ता संस्कृति सप्तमी तिथि को पसंद करती है। वैष्णव अनुयायियों के अनुसार, कृष्ण जन्माष्टमी का त्योहार हिंदू कैलेंडर की नवमी और अष्टमी तिथि पर आता है।

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